HomeDugdugi BlogStoriesकहानीः मैं टूथ ब्रश हूं

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

आप सब मुझे पहचानते हो, क्योंकि मैं हूं ही इतना पॉपुलर। कौन सा घर होगा, जहां मैं नहीं हूं। कौन सा व्यक्ति है, जिसे मेरी जरूरत नहीं है। मेरी पहचान है मेरे सॉफ्ट-सॉफ्ट बाल। ताजगी से भरपूर होना है तो मुझसे मिलो। चलिए, आपको अपनी कहानी सुनाता हूं। शुरू करते हैं-

” मम्मी आप मेरी तरफ देखो न, मैं कितना सुंदर लग रहा हूं”, दुकान पर सामान खरीदने आई पिंकी की मम्मी की ओर देखकर मैं जोरों से चिल्लाया।
“चाहे जितनी तेज शोर मचा लो, तुम्हारी आवाज कोई नहीं सुनेगा दोस्त,” मेरा एक दोस्त बोला।

मेरे और भी दोस्त… लड़ी बनकर लटके थे। सब एक से बढ़कर कलरफुल।

मेरा कलर क्या था…, मैं भूल गया…। हां, याद आया…, याद आया… मैं पिंक कलर का था।  मेरी आवाज मम्मी को सुनाई नहीं दे रही थी, पर मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैंने पूरा जोर लगाया और पूरी लड़ी जमीन पर आ गिरी।  अब हमारी आवाज सब ने सुन ली। मम्मी ने मेरी तरफ देखा और दुकानदार से बोली, भैया… एक अच्छा वाला टूथ ब्रश भी देना। अच्छा वाला टूथ ब्रश। यह सुनते ही मैं बहुत खुश हो गया। इतना खुश हो गया कि बस पूछो नहीं…।
क्या कहते हैं उसको… मेरी आंखों में आंसू आ गए। तुम, यह मत पूछना कि मेरी आंखें कहां हैं। मुझे लगा कि यहां से पैकअप करना पड़ेगा। मेरे से अच्छा यहां कौन है, भला। आप ही बताओ…।

दुकानदार ने पूरी लड़ी को उठाया। कपड़े से साफ किया और मुझे मम्मी के हवाले कर दिया। मैं सीधा झोले के अंदर। फिर पता नहीं कहां- कहां से होते हुए घर पहुंच गया।

घर ले जाकर मुझे झोले से बाहर निकाला गया। मम्मी ने आवाज लगाई, “पिंकी देखो मैं तुम्हारे लिए नया टूथ ब्रश लाई हूं”।

पिंकी ने मेरी तरफ देखा और बोली, “मम्मा कितना सुंदर ब्रश है…, पिंक कलर का”।

उसने मुझे रैपर से बाहर निकाला। बाहर की ठंडी ठंडी हवा, मुझमें जान आ गई। अब मैं खुली हवा में सांस ले रहा था। रैपर में तो दम ही घुट रहा था। इस दिन का ही तो इंतजार कर रहा था मैं।

पिंकी ने मेरे बालों को सहलाया और बोली, “मम्मा यह तो बहुत सॉफ्ट है, मुझे ऐसा ही ब्रश चाहिए था”।

अचानक पिंकी ने मुझे मोड़ दिया, ऐसा लगा कि जान निकल जाएगी। उसने कई बार ऐसा करके देखा और बोली, “मम्मा यह तो फ्लैक्सिबल भी है”।

यह शब्द मैंने पहली बार सुना था। मुझे लगा कि मेरे में कोई कमी है। मैंने कोई गलत काम कर दिया।

मम्मी ने कहा, “हां, पिंकी तभी तो यह अच्छा वाला ब्रश लाई हूं”।

एक बार फिर मेरी जान में जान आई। शुक्रिया पिंकी, तुमने मुझे लाइक किया। मैं मन ही मन बोला। मुझे लगा कि बस अब यहां जिंदगी मजे से गुजरेगी। मुझे वॉश रूम में लटके एक डिब्बे में रख दिया गया। वहां मेरी तरह और भी टूथ ब्रश थे। कोई मम्मी का, कोई पापा का और मैं पिंकी का टूथ ब्रश।

सुबह सुबह मैं यह क्या देख रहा हैं, हर कोई  टूथ ब्रश के पास आ रहा है। लगता है हम सबसे इम्पोर्टेंट हैं। सबसे पहले मम्मी ने अपना ब्रश उठाया। मम्मी वाले ब्रश का कलर… हां याद आया… ग्रीन था। वो मुझसे थोड़ा बड़ा था। मैंने तो पहली मुलाकात में ही उसको ‘हेलो अंकल’ बोल दिया था। बहुत नाराज हुआ था, बोल रहा था.. मुझे अंकल नहीं बोलना। बाद में उनसे दोस्ती हो गई थी। उसने मुझे सबके बारे में बताया दिया था। यह भी बताया था कि हम क्यों इम्पोर्टेंट हैं।

हां… पापा वाला ब्रश थोड़ा नखरीला है। वो क्या है न… महीने में दस दिन पापा के साथ सैर पर जाता है…। पता नहीं कहां- कहां जाता है। आकर बोलता है…. मैं वहां गया था, मैं तो एयरोप्लेन में घूमकर आ रहा हूं। और… तुम हो कि यहीं पड़े रहना इसी डब्बे में। बहुत गुस्सा आया उसकी ये बातें सुनकर।

मम्मी पापा वाले ब्रश वापस उसी डिब्बे में आ गए। दोनों बहुत फ्रेश मालूम पड़ते हैं। लगता है नहाकर आए हैं।

अब मेरी बारी थी….। पिंकी ने मुझे हाथ में लिया। वॉश बेसिन पर ले जाकर मेरे बालों को धोया। बालों को अंगुलियों से सहलाया। वाह, क्या शानदार अहसास हो रहा था। मुझ पर पेस्ट लगाया गया और फिर मैं दांतों की लाइन पर वॉक करने लगा। कभी आगे की ओर दौड़ता, फिर पीेछे की ओर। सामने वाले दांत… जो आपकी मुस्कुराहट में जान फूंकते हैं…., उनको सजाने संवारने का काम हम टूथ ब्रश ही तो करते हैं।

पिंकी के सामने के दांतों पर कैट वॉक करने के बाद मैं चला गया दांतों के पीछे की तरफ। भाई दांतों को तो हर तरफ से साफ करना होगा न।

पिंकी ने दांतों की सफाई करने के बाद मुझे भी अच्छी तरह नहलाया और फिर पहुंचा दिया उसी डब्बे में, जहां हम रहते हैं।

पिंकी ने आवाज लगाई, “मम्मा मेरा ब्रश तो बहुत अच्छा है”।
मुंह के आगे हथेली रखकर बाहर की ओर सांस छोड़ते हुए बोली…. “वाह क्या फ्रेशनैस है… मजा आ गया”।
मैं बहुत खुश हो गया… मेरी वजह से कोई ताजगी से भर गया।

इसी तरह दिन बीतते गए। मेरे बाल अब पहले की तरह लहराते नहीं हैं। इनमें से कुछ टूट गए। और… वो मेरे साथ डब्बे में रहने वाले मम्मी और पापा के बूढ़े ब्रश तो कब के कहीं चले गए। उनकी जगह नये ब्रश आ गए। कहते हैं कितना भी मोड़ लो… टूटेंगे नहीं। सारा दिन इतरा इतरा कर डब्बे में डांस करते रहते हैं।

एक दिन पिंकी ने भी कह दिया, “मम्मा नया ब्रश लेना है, यह वाला अब खराब हो गया। दांत ढंग से साफ नहीं करता”।

मैंने उसी दिन समझ लिया कि मैं गया काम से…। मैं इतना घबरा गया था कि एक दिन पिंकी के हाथ से छूटकर नीचे गिर गया।

उस दिन के बाद से सुबह- सुबह किसी ने मेरे बालों को नहीं सहलाया और न ही मुझे नहलाया। वो दिन और आज, मैं कभी पिंकी के मोती से चमकते दांतों पर कैट वॉक नहीं कर पाया। उसी दिन खुद पिंकी ने मुझे कचरे में फेंक दिया।

उस पिंकी ने, जिसकी मुस्कुराहट में चार चांद लगाने का काम कर रहा था। खैर कोई बात नहीं, मैंने घर से बाहर की दुनिया भी देख ली।

दूसरे दिन सुबह मैं एक बड़े डब्बे में था, जहां मेरे जैसे कितने टूथ ब्रश, खिलौने, बासी खाना, सब्जियों के छिलके, पॉलीथिन, प्लास्टिक के टुकड़े, पानी की बोतलें, प्लास्टिक, थर्माकोल गिलास, प्लेटें, दवाइयों के रैपर, आलपीन, रुई, दवा पट्टी, इंजकेशन, ग्लूकोज की नलियां, पुराने फटे कपड़े, ब्लेड, डब्बे, टूटे फूटे पैन, कागज, गत्ते, नमकीन बिस्कुट के रैपर, बल्ब, कांच के टुक़ड़े … और भी न जाने क्या- क्या था उसमें… मैं आपको बता नहीं सकता। सब धूल मिट्टी में सने एक साथ पड़े थे… एकदम मिक्स। दुर्गंध के मारे जान निकल रही थी…। सब बेहाल…।

हम सब बुरी तरह कांप रहे थे, हमारे में कुछ कराह रहे थे…। हमारी आवाज किसी को सुनाई नहीं दे रही थी। मैंने समझ लिया था कि यहां से हमारी अंतिम यात्रा शुरू होने वाली है। एक बड़ी सी गाड़ी आई और कचरे का वह बड़ा डब्बा खाली हो गया। फिर सब गाड़ी में भर दिए गए। सबकुछ मिक्स हो गया… कौन क्या था… छांट नहीं सकते। धूल मिट्टी और बासी खाना… सब एकदम मिक्स हो गए। सब्जियों के छिलके नमकीन बिस्कुट के रैपर में भर गए और वो.. दवा पट्टी तो पानी की बोतलों पर लिपट गईं। थर्माकोल के गिलास में भर गए टूटे हुए कांच के टुकड़े। मत पूछो…क्या से क्या हो गया।

मैं थोड़ा किस्मत वाला था कि वहीं सड़क पर गिर गया। मेरे साथ कुछ बोतलें, रैपर भी सड़क पर पड़े रह गए और फिर हम सब को देखकर इंसान बोल रहे थे…”ये कूड़ा भी न मुसीबत बन गया”।

मैंने अपनी बची खुची पूरी ताकत को समेटा और चिल्लाया … “हम मुसीबत बन गए… या तुम, हमारी यह हालत तुम्हारी वजह से हुई है। माना कि अब हम तुम्हारे किसी काम के नहीं रहे… पर क्या तुम्हारा फर्ज नहीं था… हमें अच्छे से निपटाते। पहले तो तुमने हमें बनाया और फिर काम निकलते ही फेंक दिया यूं ही सड़कों और कचरे के डिब्बों में… अपनी आफत बनने के लिए। मेरे अंदर अभी भी बहुत जान है, क्या तुम तैयार हो, मुझे फिर से कुछ नया बनाने के लिए… जो तुम्हारे काम आ सकूं और संवार सकूं तुम्हारी जिंदगी को…,तुम्हारे लिए शानदार पैन बनकर, तुम्हारे हाथों की घड़ी बनकर, तुम्हें खाना खिलाने वाली प्लेट बनकर, तुम्हारे स्कूल का बैग बनकर, हो सकता है… मैं अस्पताल के वेंटीलेटर सिस्टम का हिस्सा बन जाता। यह भी हो सकता है कि मैं आपरेशन टेबल बना देता। किसी बच्चे का खिलौना बनकर उसको हंसाने का काम भी कर सकता हूं मैं। स्कूल की डेस्क बन सकता हूं मैं। एक बार मुझे फिर से नई जिंदगी देकर तो देखो…। मुझे संभालना तो सीखो… सच बताऊं… फिर कभी तुम्हारे लिए आफत नहीं बनूंगा…”।

पर, मेरी तेज आवाज को भी यहां कोई सुनने वाला नहीं है। मैं अपनी बात कहकर बेहोश हो गया, मुझमें ताकत तो थी नहीं।

सड़क पर पड़े पड़े, गाड़ियों के टायरों के दब-दबकर, हवा में उड़ते हुए, बिखरते हुए, मैं सड़क किनारे पर आ गया और अब इंतजार कर रहा हूं, उस समय का, जब मुझे सही तरह से निस्तारित करके फिर से प्लास्टिक का सामान बनने के लिए भेजेगा।

आपका धन्यवाद, आपने मेरी कथा और व्यथा को पढ़ा और सुना।

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Editor

Rajesh Pandey

Journalist & Writer

Having 23 Years of experience in Mass Media and content writing in Hindi. Tak Dhinaa Dhin is a a storytelling platform Initiative for kids. Our aim is to motivate children to write stories. We believe that imagination is must to reach near reality.

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