HomeDugdugi Blogपानी का मोल और कुएं पर लगता था मेला
पहले हर घर में नल नहीं था, तब पानी बहुत कीमती होता था। बहुत ध्यान से पानी का इस्तेमाल होता था। एक बाल्टी में ही नहाने का टास्क पूरा करना होता था।कपड़े धोने के लिए काफी संख्या में लोग आसपास की नहरों पर चले जाते थे। ये नहरें बहुत साफ होती थीं और इनमें कपड़े धो सकते थे।
अब तो इनकी हालत देखकर दुख होता है। कुछ नहरें तो बंद सी ही हो गईं। मुझे अच्छी तरह याद है कि डोईवाला में चीनी मिल तिराहे के पास एक नहर थी, जिस पर घराट भी चलती थी। मौका मिलते ही हम बच्चे उसमें कूद जाते थे और फिर मन भर कर नहाते थे। घर आकर बहाने बनाते और डांट खाने को मिलती। आज जब भी उस नहर को देखता हूं तो मन दुखी हो जाता है।
जब तक हमने पानी के मूल्य को जाना, तब तक हमारे आसपास खेतों को सींचने वाले नहरें स्वच्छ रहीं। बहता पानी कभी नष्ट नहीं होता, जैसे-जैसे आगे बढ़ता जाता है, उसका इस्तेमाल होता रहता है। तभी तो हमारे बुजुर्ग कहते हैं कि बहते जल को स्वच्छ रखना चाहिए। उसमें गंदगी नहीं फेंकनी चाहिए, क्योंकि उसे आपसे भी आगे किन्हीं और लोगों को इस्तेमाल करना है।
पहले घर दूर-दूर बने होते थे और उनके बीच में होते थे हरेभरे खेत। इन खेतों को दूर किसी नदी से निकलीं नहरें सींचती थीं। अब तो गांव से कस्बा और कस्बे से शहर बन गए इलाकों में खेत ही नहीं रहे, तो नहरों का क्या काम। पर, जैसे जैसे घरों की संख्या बढ़ती गई, ये नहरें अब नदी से पानी नहीं लातीं। इनका काम बदल गया है, ये अब घरों के दूषित पानी को ढोती हैं। ये नालियां बन गई हैं। कुल मिलाकर यह कहें कि साफ पानी वाली नहरों की मौत हो गईं और उनकी जगह गंदगी ढोने वाली नालियां रेंगने लगीं। ये नालियां आगे बढ़कर किसी नदी में मिल रही हैं। हमारे शहर देहरादून में रिस्पना, बिंदाल और सुसवा जैसी साफ नदियों के साथ भी तो ऐसा ही हुआ है।
जब मैं छोटा था, यही कोई 10-12 साल का, तब कुछ ही घरों में नल थे। लोग अपने पड़ोसियों के घरों में लगे नलों से पानी भरते थे। बड़ी संख्या में लोग कुओं से भी पानी भरते थे। मेरे घर के पास शिव मंदिर परिसर में एक कुआं है। अब तो वर्षों से इस कुएं पर पानी नहीं भरा जाता। इसे जाली से ढंक दिया गया है और इसके आसपास काफी घास उग आई है। पानी लेने के लिए कभी यहां भीड़ लगाने वाले लोगों ने अब इस पुराने कुएं को लगभग भुला दिया है।
मुझे याद है कि रस्सी से बंधी बाल्टी को मुंडेर पर लगी चरखी के सहारे गहरे कुएं में डाला जाता था। थोड़ी देर में पानी से भरी बाल्टी को ऊपर खींचा जाता। हिलती डुलती पानी छलकाती बाल्टी कुएं से बाहर आ जाती। कई बार तो ऐसा भी हो जाता कि बाल्टी रस्सी से छूटकर कुएं में ही रह जाती। बड़ा दुख होता था कि पानी के चक्कर में बाल्टी से भी हाथ धोना पड़ा।
हमने इस कुएं का पानी खूब पीया। उस समय लोग कुएं से पानी भरने में एक दूसरे की मदद भी करते थे। कुछ लोग तो कुएं से थोड़ा दूर कपड़े धोते हुए दिख जाते थे। मेला सा लगा होता था यहां।
सुबह हो या शाम हो या फिर दोपहर, कुएं ने पानी लेने से कभी मना नहीं किया।कुएं के पास छोटे बच्चों का आना मना था। वर्ष में एक बार इसकी सफाई होती थी। मोटी- मोटी रस्सियों के सहारे कुछ लोग कुएं में उतरते थे और फिर उसमें जमा कीचड़ को बड़ी बड़ी बाल्टियों से ऊपर खींचा जाता था।
इसी कीचड़ में छूटी हुई बाल्टियां भी बाहर आ जाती थीं। लोग कीचड़ में अपनी-अपनी बाल्टियों को ढूंढते थे। कुएं की सफाई सभी लोगों की सहभागिता से होती थी। कुएं में जल के स्रोत बंद न हो जाएं, इसलिए इनकी सफाई बहुत जरूरी होती है।
क्या आपको पता है कि देहरादून के पास एक गांव है, जिसका नाम कुआंवाला है। यह नाम शायद इसलिए पड़ा, क्योंकि यहां मुख्य मार्ग पर ही एक बड़ा सा कुआं था। कई साल पहले कुएं को बंद कर दिया गया, क्योंकि मुख्य मार्ग को फोर लेन करना था। अब तो सिर्फ नाम ही रह गया, कुआंवाला को कुआं तो कब का अलविदा कह चुका है।
हां, तो मैं बात कर रहा था, अपने घर के पास वाले कुएं की। जब भी कभी मौका मिल जाता, तो नजर बचाकर, हम बच्चे ऊंची मुंडेर से कुएं में झांकते और तेज आवाज में कुछ न कुछ चिल्लाते थे। कुआं भी कहां चुप रहता, वो हमारी आवाज को वापस कर देता। ऐसा लगता कि कुआं हमारी बात का जवाब दे रहा है। हम अपना नाम लेते तो जवाब में कुआं भी हमारा नाम लेता।
इसको विज्ञान में प्रतिध्वनि (इको) कहते हैं। मैं तो बच्चों से कहूंगा कि अगर आपको कहीं कुआं दिखता भी है तो उसके पास नहीं जाना और न ही उसमें झांकना। कुएं को दूर से ही देखना।
कुआं हो या जल का कोई अन्य स्रोत, उनकी देखरेख करनी चाहिए। जल तो स्रोत से ही मिलता है। आपके घर नलों में आने वाला पानी भी धरती के भीतर से निकाला जाता है। धरती में जल का भंडार है, यह तभी तक सुरक्षित रहेगा, जब तक हम पानी का संरक्षण करते रहेंगे। हम वर्षा का पानी इकट्ठा करके दैनिक कार्यों में उसका इस्तेमाल कर सकते हैं। नदियों सहित जल के किसी भी स्रोत को गंदा न करें। फिर मिलते हैं…
अभी के लिए बस इतना ही…अगली बार आपसे और भी बहुत सारी बातें करेंगे। हमें इंतजार रहेगा, आपके सुझावों का। हमारा व्हाट्सएप नंबर-9760097344
Key words: Dug dugi Blog, Rajesh Blog, My Blog, Story for Kids, Kids Education
spot_img

Related Posts

Editor

Rajesh Pandey

Journalist & Writer

Having 23 Years of experience in Mass Media and content writing in Hindi. Tak Dhinaa Dhin is a a storytelling platform Initiative for kids. Our aim is to motivate children to write stories. We believe that imagination is must to reach near reality.

Latest Posts